भाजपा ने अति पिछड़ी जातियो को सिर्फ वोट बैंक समझ किया अधिकारों से वंचित
लखनऊ, 25 नवम्बर । राष्ट्रीय निषाद संघ के राष्ट्रीय सचिव चौधरी लौटन निषाद ने भाजपा पर अति पिछड़ी जातियों को अधिकार वंचित करने का आरोप लगाते हुए कहा कि हिन्दुत्व के नाम पर भाजपा सिर्फ ईबीसी व एमबीसी की जातियों को वेाट बैंक समझती है। मंडल विरोधी भाजपा कभी पिछड़ों,अति पिछड़ों की हितैषी नहीं हो सकती । चुनाव के समय पिछड़ों दलितों व आदिवासियों को हिन्दू कहकर इनकी वोट की बदौलत सत्ता हथियाने के बाद इनके साथ दोयम दर्जे का ही बर्ताव करती है। विधानसभा चुनाव-2022 में 33 प्रतिशत से अधिक संख्या वाली अत्यन्त पिछड़ी जातियां निर्णायक की भूमिका निभायेंगी। किसी भी राजनैतिक दल ने इस वर्ग के साथ सामाजिक-राजनीतिक न्याय नहीं किया।
निषाद ने उत्तर प्रदेश के जातिगत समीकरण पर प्रकाश डालते हुये बताया कि हिन्दू, मुस्लिम सामान्य वर्ग की जातियां- 20-94 प्रतिशत, यादव-10-48 प्रतिशत, निषाद/कश्यप - 10-46 प्रतिशत, जाटव- 11-86 प्रतिशत, कुशवाहा/मौर्य/सैनी-4-85 प्रतिशत, कुर्मी- 4.10 प्रतिशत, लोधी/किसान-3-60 प्रतिशत, पासी-3-87 प्रतिशत, पाल/बघेल-2-38 प्रतिशत, जाट-1-94 प्रतिशत, प्रजापति - 1-84 प्रतिशत, बढ़ई/लोहार- 1.72 प्रतिशत, तेली/साहू-1.61 प्रतिशत, राजभर-1.31 प्रतिशत, चौहान-1.26 प्रतिशत, कोरी- 1.11 प्रतिशत, नाई-1.06 प्रतिशत, कांदुु/भुर्जी -1.01 प्रतिशत, गुर्जर-0.72 प्रतिशत हैं।आगामी विधानसभा चुनाव में अति पिछड़ी,अत्यंत पिछड़ी व अति दलित जातियों की खासी भूमिका रहेगी। प्रजाजाति के रूप में ख्यात लोहार, बढ़ई, कुम्हार, बरई, बारी, नाई, हज्जाम,धोबी आदि जिन्हें राजनीतिक रूप से महत्व नहीं दिया जाता, कम संख्या होने के बाद भी पंचफोरन वाली प्रजाजातियों की संख्या हर विधानसभा में 40 से 70 हजार तक होती है। जो फ्लोटिंग वोटर के रूप में चुनाव की दिशा-दशा बदल देती हैं।
निषाद ने कहा कि अब अति पिछड़ी व अत्यन्त पिछड़ी जातियों के अंदर भी राजनीतिक इच्छाशक्ति, भूख, व सम्मान की भावना जागृत हुई है। इन जातियों की उपेक्षा करने वाला कोई भी राजनैतिक दल सत्ता का हकदार नहीं बन सकता। अब ईबीसी व ,एमबीसी की जातियों में भी राजनीतिक महत्वाकांक्षा व प्रतिनिधित्व की भावना पैदा हुई है। "जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी" को केवल भाषण का रूप ही नहीं मूर्त रूप देना पड़ेगा। इन वर्गों की जो उपेक्षा करेगा, वह खुद राजनीतिक रूप से पीछ़े चला जायेगा। सोशल इंजीनियरिंग व माइक्रो सोशल इंजीनियरिंग के आधार पर संगठन में सम्मान व टिकट वितरण में हिस्सेदारी की आकांक्षा अत्यन्त पिछड़ों में तेजी से बढ़ी है। इस वर्ग की जातियां सत्ता का खेल बनाने व बिगाड़ने में अहम भूमिका निभाती हैं।
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