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Thursday, 30 December 2021

मत्स्य पालक कृषक प्रशिक्षण। विदइन डिस्ट्रिक्ट एट के. वी. के

 


कठौरा, अमेठी|सब मिशन ऑन एग्रीकल्चर एक्सटेंशन 'आत्मा' योजना अंतर्गत मत्स्य पालक कृषक प्रशिक्षण। विदइन डिस्ट्रिक्ट एट के. वी. के, एक दिवसीय मत्स्य पालक कृषक प्रशिक्षण गुरुवार को कृषि विज्ञान केंद्र कठौरा में संपन्न हुआ । जिसमें मत्स्य पलकों, मछुआरों की आय कैसे दुगनी हो इस पर विशेष प्रशिक्षण दिया गया। समन्वित कृषि प्रणाली, तालाब के बांधों का उपयोग कर पपीता, अमरूद, अरहर, परवल की खेती और तालाब मे मचाना बनाकर बतख पाल कर मछुवा किसान अपनी आय को दुगुना कर सकते हैं। 


प्रशिक्षण में बताया गया कि तालाबों में ऑक्सीजन की कमी के कारण तालाब में मछलियां मरने लगती हैं जिसके उपचार हेतु बुझे हुए चूने का प्रयोग किया जाना चाहिए व लाल दवा का छिड़काव करना चाहिए।पानी का लेवल साल भर पांच फीट रहना चाहिए जिससे ऑक्सीजन की कमी ना हो।खरपतवार, जलकुम्भी समय समय पर निकालते रहना चाहिए। मत्स्य पालको को मत्स्य पालन संबंधी नवीनतम तकनीकी ज्ञान से अवगत कराया और अधिक लोगों को मत्स्य पालन करने के लिए उत्साहित करते हुए कहा कि कम जमीन कम पैसा खर्च करके मछली पालन करके परिवार की आजीविका चलाई जा सकती हैं। इस मौके पर डॉ. आर के आनंद, डॉ ओपी सिंह, ए डी एफ ए के शुक्ला, एस बी सिंह जी ,श्री राम राज निषाद जी अनिरुद्ध कुमार वर्मा, रामू मौर्य, राजू कश्यप सहित सैकड़ों मत्स्य पालक मौजूद रहे।

Friday, 24 December 2021

मत्सय पालक कृषक प्रशिक्षण विदइन डिस्ट्रिक्ट एंड विलेज की ब्लॉक स्तरीय बैठक हुई संपन्न |

बैठक में मत्स्य पालक विकास अभिकरण तलाब उत्पादन नवीनतम तकनीकी ज्ञान से लोगो को अवगत कराया गया|


जनपद अमेठी के विकासखंड  जामो के ग्राम बीरीपुर में दिनांक 24 दिसंबर 2021 को रामजीत पुत्र श्री राम सुख के तालाब पर

 मत्स्य पालक कृषक प्रशिक्षण विदइन डिस्ट्रिक्ट एंड विलेज के कार्यकर्ताओं ने एक मीटिंग रखी| मीटिंग में कुशल मत्स्य पालक वैज्ञानिक सेवानिवृत्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी  व सेवानिवृत्त तालाब उत्पादन विशेषज्ञ श्री एसबी सिंह जी एवं मत्सय पालक प्रभारी रामराज निषाद जी (म० प्र०) मत्स्य पालक विकास अभिकरण अमेठी के अधिकारी व कर्मचारी गण मत्स्य पालकों को मत्स्य पालन संबंधी नवीनतम तकनीकी ज्ञान से अवगत कराया और अधिक लोगों को मत्स्य पालन करने के लिए उत्साहित किया और साथ ही साथ तालाबों का निरीक्षण करते हुए भ्रमण किया|



 इस मीटिंग के दौरान  इच्छुक मत्सय पालको को  तालाब खुदवाने से पहले  क्या-क्या करना है और तालाब खुदवाने के बाद क्या-क्या करना है इसकी समुचित जानकारी मीटिंग के दौरान दी गई है |मीटिंग में भाग लेने वाले मत्स्य पालक रामसुख, राजू कश्यप ,वीरेंद्र गौड़, रामगुलाम, दीपक कश्यप सहित सैकड़ों लोग मौजूद रहे|

Friday, 4 September 2020

वैज्ञानिक तकनीक से अधिक मत्स्य उत्पादन

  1. 1-मत्स्य पालन की आवश्यकता

मछली एक शक्ति वर्धक एवं पौष्टिक खाद्य पदार्थ है यह खाने में स्वादिष्ट और सुपाच्य होती है। मछली में आवश्यक अमीनो एसिड तथा प्रोटीन की अधिक मात्रा पाई जाती है। इसके अतिरिक्त वसा, कैल्शियम व खनिज भी पाए जाते हैं। जिनके कारण संतुलित आहार में मछली की विशेष उपयोगिता है ऐसे कई उदाहरण हैं जिनसे यह विदित होता है कि प्राचीन काल में भी मछली पालन होता था तथा मछली को आदिकाल से पौष्टिक आहार व मनोरंजन का उत्तम साधन माना गया है जो। मनुष्य के भोजन व देश की अर्थव्यवस्था में मछली की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसका अनुभव करते हुए वर्ष 1926 में रॉयल कमीशन ऑफ़ एग्रीकल्चर की संसाधनों के विकास में बल दिया तथा प्रदेश में मत्स्य विभाग की स्थापना के लिए अपना मत रखा। उत्तर प्रदेश में स्वतंत्रता के पूर्व युद्धकाल की  एक आवश्यकता के रूप में मत्स्य विकास कार्यक्रम वर्ष 1944 में प्रारंभ किया गया था। "अधिक अन्न उपजाओ" कार्यक्रम के अंतर्गत उस समय तालाबों से मछली निकालकर सेना के जवानों को भेजे जाने का कार्य किया जाता था। वर्तमान में उत्तर प्रदेश मत्स्य विभाग, मत्स्य पालन के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान देने के लिए दृढ़ संकल्प है। विशेषकर ग्रामीण अंचलों में सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से पिछड़े लोगों की प्रगति में विभाग द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जा रही है।
भारतीय इतिहास में मछली दर्शन और भोजन दोनों दृष्टि से शुभ और श्रेष्ठ मानी जाती है यह कथन अपने आप में पर्याप्त महत्व रखता है, कि जिस पानी में मछली नहीं है, उस पानी की जल-जैविक स्थिति सामान्य नहीं है। पानी और मछली दोनों एक-दूसरे से काफी जुड़े हैं। पर्यावरण को संतुलित रखने में मछली की विशेष उपयोगिता है। शरीर के पोषण तथा निर्माण में संतुलित आहार की आवश्यकता होती है। संतुलित आहार की पूर्ति विभिन्न खाद्य पदार्थों को उचित मात्रा में मिलाकर की जा सकती है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन, खनिज लवण आदि की आवश्यकता होती है। स्वस्थ शरीर के निर्माण हेतु प्रोटीन की अधिक मात्रा होनी चाहिए। मछली, मांस, अंडे, दूध, दालो आदि का उपयोग प्रमुख रूप से किया जाता है। मछलियों में लगभग 70 से 80% पानी 13 से 22% प्रोटीन एक से 3.5% खनिज पदार्थ 0.5 से 2.0% बसा पायी जाती है।  विश्व के सभी देशों में मछली के विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर उपयोग में लाए जाते हैं। मछली एक उच्च कोटि का खाद्य पदार्थ और मत्स्य पालन मत्स्य व्यवसाय के रूप में एक श्रम प्रधान व्यवसाय हैं। इसमें कम पूंजी लगाते हुए अधिकतम लाभ अर्जित जाने की पर्याप्त संभावनाएं हैं। जनसंख्या में निरंतर वृद्धि के परिणाम स्वरुप रोजी-रोटी की समस्या के समाधान के लिए अत्यधिक आवश्यक है कि आज के प्रगतिशील युग में ऐसे कार्यक्रम अपनाए जाएंगे जिनके माध्यम से खाद पदार्थों के उत्पादन के साथ-साथ भूमिहीनों, निर्धनों, बेरोजगारी, मछुआरों आदि के लिए रोजगार के साधनों का सृजन भी हो सके। मछली पालन का व्यवसाय निश्चित ही रोजी रोटी का एक उत्तम साधन है। मत्स्य पालन द्वारा तमाम मुल्य जल संपदा का उपयोग करके उत्तम प्रोटीन युक्त पौष्टिक खाद्य पदार्थ के उत्पादन के साथ-साथ बेरोजगारों और दुर्बल  वर्ग के व्यक्तियों के लिए अतिरिक्त आय का साधन भी है। 

2. मत्स्य पालन तालाब हेतु स्थल चयन व निर्माण तकनीक

जिस प्रकार कृषि के लिए भूमि आवश्यक है ठीक उसी प्रकार मत्स्य पालन के लिए तालाब की आवश्यकता होती है। ग्रामीण अंचलों में विभिन्न आकार प्रकार के तालाब, पोखरे पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं, जो कि निजी ग्राम सभाओं का  अथवा संस्थाओं की संपत्ति होते हैं।ऐसे जल संसाधन या तो निष्प्रयोज पड़े रहते हैं अथवा उनके उपयोग परंपरागत उपयोग जैसे- मिट्टी निकालने, मवेशियों को पानी पिलाने, सिंघाड़े की खेती,आदि के लिए किया जाता रहा है। मत्स्य पालन हेतु 0.2 हेक्टेयर से बड़े तालाबों का चयन किया जाना किया जाना चाहिए जिनमें वर्ष भर या कम से कम आठ नौ माह पानी भरा रहता है।तालाब की मिट्टी मटियारी, दोमट, काली मिट्टी अधिक उपयोगी होती है। तालाबों का चुनाव क्षेत्र में किया गया जो बाढ़ से प्रभावित ना हो तथा तालाब तक आसानी से पहुंचा जा सके। तालाबों में कमियां स्वाभाविक रूप से पाई जाती हैं। जिसके लिए तालाब का सुधार एक आवश्यक प्रक्रिया है सुधार के अंतर्गत तालाब के कम गहराई वाले स्थान से मिट्टी निकाल कर बाहर स्तर से अधिक ऊंचे बांध का निर्माण करना चाहिए तथा पानी आने वाले वह बाहर निकालने के रास्ते में जाली की व्यवस्था आवश्यक है जिससे पाली जाने वाली मछलियां बाहर न जा सकें और अवनछीय मछलियां तालाब में ना आ सके तालाब सुधार कर माह अप्रैल-मई तक अवश्य कर लेना चाहिए। जिससे मत्स्य पालन समय से प्रारंभ किया जा सके नए तालाब के निर्माण हेतु उपयुक्त स्थल का चयन आवश्यक है नए तालाब के निर्माण के लिए मिट्टी की जल धारण क्षमता व उर्वरता को चयन का आधार माना जाना चाहिए। काली, दोमट, चिकनी मिट्टी, वाली भूमि में तालाब निर्माण उपयुक्त होता है, इस मिट्टी में जल धारण क्षमता अधिक होती है। मिट्टी का पी. एच. 6.5 से 8.0 उपयोगी माना गया हो | तालाब निर्माण के पूर्व मृदा परीक्षण मत्स्य विभाग की प्रयोगशाला अथवा अन्य प्रयोगशालाओं से अवश्य करा लेना चाहिए। नए तालाबों के निर्माण के लिए निम्नांकित बातों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है-

स्थल चयन-

 1- तालाब हेतु प्रस्तावित स्थल बाढ़ वाले क्षेत्र में नहीं होना चाहिए।
2- गहरे नाले,जलाशय अथवा नदी के समीप वाला स्थान उपयुक्त नहीं होता हैं। 
3- क्योंकि इसमें सीपेज की संभावना बनी रहेगी और तालाब में पानी नहीं रुकेगा। 
4- जमीन निकली होनी चाहिए जिसमें वर्षा का पानी बहकर एकत्रित हो सके। 
5- तालाब निर्माण हेतु प्रस्तावित स्थल के मिट्टी की जांच मिट्टी की उपयुक्त हेतु अवश्य करा लेनी चाहिए। 

तालाब का आकार, साइज व गहराई :-

सामान्यता 0.50 हेक्टेयर से 1.0 हे. क्षेत्रफल का तालाब मत्स्य पालन के लिए अधिक उपयुक्त होता है। तालाब निर्माण आयताकार होना चाहिए। मत्स्य निकासी जाल चलाने आदमी आसानी होती है लंबाई-चौड़ाई का अनुपात 3:1 आदर्श माना जाता है।  तालाब की गहराई 1.5 से 2 मीटर तक साइज के अनुसार होनी चाहिए। जिससे उसमें कम से कम 1 मीटर पानी हमेशा बना रहे। 

बाँध निर्माण :-

तालाब के चारों तरफ बंधे काफी मजबूत होने चाहिए जिससे तालाब में मछली पालन हेतु पानी का आवश्यकता अनुसार भराव हो सके और रिसाव भी रूक सके। बन्धा के ऊपरी सतह की चौड़ाई कम से कम 1 मीटर होना चाहिए तथा बांधों के हार्जेटल व वर्टिकल स्लोप में 1:5:1 अथवा 2:5:2 का अनुपात होना चाहिए। बांधों के सतह पर छोटी घास लगा देनी चाहिए जिससे बंधो की मजबूती हो ताकि कटाव ना होने पाए। बन्धो पर घने छायादार पेड़ नहीं लगाना चाहिए। केला का पेड़ लगाना सबसे उपयुक्त होता है पूर्व दिशा को छोड़कर तीनों तरफ केले का पेड़ लगाया जा सकता है।
इनलेट/आउटलेट का निर्माण:-
तालाब में पानी आने वहां पर जाने के लिए सीमेंटेड इनलेट व आउटलेट का निर्माण आवश्यक कराना चाहिए। इनलेट आउटलेट पर 1/ 10 इंच मेस साइज की लोहे की काली जाली लगाना चाहिए। जिससे तलाब से मछली के बच्चे/मछलियां बाहर ना जा सके तथा बाहर से आवांछनीय मछलियां तालाब के अंदर न आने पाए। 

मत्स्य पालक कृषक प्रशिक्षण। विदइन डिस्ट्रिक्ट एट के. वी. के

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